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श्री त्रिवेणी जैन तीर्थ में भक्तों ने किया श्री बाहुबली भगवान का मंगल अभिषेक

श्री त्रिवेणी जैन तीर्थ में भक्तों ने किया श्री बाहुबली भगवान का मंगल अभिषेक
शांतिधारा के साथ उत्तम आर्जव धर्म का पूजन ।🙏🏼🙏🏼

भिलाई। श्री त्रिवेणी जैन तीर्थ सेक्टर-6 में आज दशलक्षण महापर्व में भक्तों ने उत्तम मार्दव धर्म दिवस के अवसर पर
श्री पार्श्वनाथदिगम्बर जैन महासभा के भक्तों द्वारा आज श्री 1008 महावीर भगवान श्री 1008 आदिनाथ, श्री भरत बाहुबली भगवान का भक्तो ने केसरीया, धोती दुपट्टा धारण कर चांदी के कलशों से मंगल अभिषेक किया।
इस अवसर पर परमपूज्य आचार्य 108 श्री विमर्श सागर महाराज की परम शिष्या आर्यिका विद्वांत श्री माता जी एवं आर्यिका विजयांत श्री माताजी के अमृत वचनों से शांतिधारा, अभिषेक करने वालों म दिगम्बर जैन महासभा के अध्यक्ष ज्ञानचंद बाकलीवाल,उपाध्यक्ष प्रवीण छाबड़ा, देवेंद्र जैन, मंत्री प्रशांत जैन,कोषाध्यक्ष नरेंद्र जैन, उपमंत्री सिम्पी जैन, भारत गोधा,सहकोषाध्यक्ष अमित जैन, जैन मिलन अध्यक्ष मुकेश जैन, मुकेश बाकलीवाल, अरूण बाकलीवाल,सुनील जैन सोमेश बाकलीवाल, अशोक संगीत निगोतीया,निशांत जैन, संजीव जैन, महेंद्र काला,अनिल जैन, प्रमोद नाहर, संतोष जैन, राजेश जैन, प्रदीप जैन बाकलीवाल, संतोष विनायके,आशीष जैन आदि शामिल रहे। भक्तों ने सपरिवार देवशास्त्र, गुरु, दशलक्षण के आर्जव धर्म की पूजन भक्ति भाव के साथ किए। दिगम्बर जैन मंदिरजी में श्री पार्श्वनाथ 🙏🏼भगवान की प्रतिमा के समक्ष भक्तो ने संध्या भक्ति संगीत के साथ आरती नृत्यगान किया। जानकारी देते हुए प्रदीप जैन बाकलीवाल ने बताया कि 6 सितंबर को प्रतिदिन अनुसार प्रात: 06.30 स 08.30 धार्मिक क्रियायें, अभिषेक, पूजन, तत्पचात प्रवचन होंगे।
जीवन हमेशा प्रसन्नता के रथ पर सवार हो: आर्यिका माता जी
उत्तम आर्जव धर्म का सार बताते हुए परम पूज्य आर्यिका माताजी ने अपने अमृत वचन में बताया कि जीवन हमेशा प्रसन्नता के रथ पर सवार हो, खुशियों का दामन ना छोड़े इसके लिए दशलक्षण धर्म का तीसरा कदम यानी उत्तम आर्जव धर्म अपनाना अत्यंत आवश्यक है। हमारे आचार्यों ने मन वचन और काय से सात्विक व्यक्ति के आचरण को आर्जव धर्म माना है। जब मनुष्य का मन, वचन और काय किसी एक कार्य में एक साथ लग जाए तो समझ लेना चाहिए कि उसके जीवन में आर्जव धर्म का प्रवेश हो चुका है। समस्त शुभ अशुभ कार्य का बांध भी मन, वचन व काय ही होते हैं। जब व्यक्ति मन, वचन व काय को शुभ कार्य में लगाता है तो सुख, शांति और समृद्धि का अनुभव करता है। वहीं जब अशुभ कार्य में इनका इस्तेमाल करता है कि दुख व कलेश का अनुभव करता हुआ मानसिक संतुलन खो बैठता है। इससे भी कहीं अधिक जब शुभ अशुभ कार्य को छोड़ स्वयं में स्थिर हो जाता है तो वह परमात्मा बन जाता है। आर्जव धर्म के आभाव में ही व्यक्ति मानसिक रोगों से घिरता है। कपट के भ्रम में जीना दुखी होने का मूल कारण है। वर्तमान में जीने वाला व्यक्ति ही आर्जव धर्म को स्पर्श कर सकता है। इस तरह से उत्तम आर्जव धर्म हमें सिखाता है कि मोह, माया, बुरे कर्मांे को यदि हम छोड़ दे और सरल स्वाभाव अपना लें तो परम आनंद मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं।

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